Tuesday, April 14, 2026

Krishna



O Krishna, sitting in my heart,

O beloved of my Gurudev, O beloved of the entire Universe!

With the most beautiful eyes,

You play in lanes of Vrindavan. 


Giving smiles to everyone around,

Giving miles of divinity to everyone who surrounds.

Writing for you is a blessing for one, 

While I write or unwrite, be in my mind ever like a sun.

I don't know if I love you,

Love is your Property, you are the Landlord of Love.

But I belong to you, says the bottom of my heart,

I belong and will always belong to you,

You yourself assured in your words!

I surrender my 'I' to you,

Without a second thought, may it cease & what remains is just you.


Even though I can't imagine your beauty from my impure mind,

Yet you have given me a chance to chant your name in this lifetime!

Your name is precious, and so is one's lifetime,

Hold my life with your hand, to make sure ,I never fall off your divine ride!


O beloved of my Gurudev, Pls forgive me for all my mistakes,

I thank you, I love you, I surrender now and always.


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Sunday, March 8, 2026

Shakti - शक्ति

 



नारी शक्ति स्नेह , संवेदना , पोषण, मातृत्व , शीलता और आत्म शक्ति की सुनहरी खान  है ,

तो पुरुषत्व साहस ,स्थिरता ,संयम , सुरक्षा , अस्तित्व ,तर्क और विजय का उद्गम स्थान है |

दौड़ इस बात की न हो ,

की समाज पुरुष प्रधान है या स्त्री प्रधान ,

विचार इस बात का हो ,

की पुरुषत्व और नारी शक्ति क्या हर मानव में हो सकती हैं एक समान ?


जो देह मिली पुरुष की तो क्या पुरुषत्व का सम्मान हम कर पाए ?

जो देह मिली नारी की तो क्या शक्ति को सम्मान हम दे पाए ?


कहतें हैं उपनिषद , गीता यही |

समझना स्वयं को देह केवल , मानव का परम लक्ष्य नहीं |

खोजे स्वयं को जो पाए , शिव शक्ति में भेद नहीं ,

फिर दौड़ कहाँ , अंतर भी कहाँ , जब सब एक वही ||

मान्यताओं और कल्पनाओ के ढेर से सृष्टि सजी ,

हटें कल्पनाओं के बादल जब , निर्दोष प्रेम की ही बंसी सुनी |


Sunday, September 14, 2025

हिंदी दिवस कविता




(on a lighter note)

 😊

हिंदी दिवस की आप सबको हार्दिक बधाई,

विदेश में होकर भी , जो मातृ भाषा को संजोए हैं,

उन्हें धन्यवाद देने की यह सुंदर घड़ी आई। 


सोचा मैंने एक दिन, पूरे दिन में मेरी कितनी पंक्तियां  शुद्ध हिंदी में होती हैं,

गौर से देखा तो हर sentence में एक न एक तो अंग्रेजी या उर्दू  की शब्दावली है। 


एक मित्र से प्रेरणा पाई हिंदी में हस्ताक्षर करने की,

यह सुझाव अच्छा लगा इसीलिए सोचा सांझा करने की। 


फिर कुछ पंक्तियां सोची जो अगर शुद्ध हिंदी में हो,

तो मधुर बनेगा यह जीवन , प्रेम होगा चारो और,

देखिएगा ध्यान से ,पंक्तियों पर करना गौर,

बदलाव की नींव खुद से ही है, चाहे मचाएं हम पूरे गांव में शोर । :) 


आयो खाना खालो थोड़ा rude लगता है,

पर आइए भोजन पाइए सुंदर आग्रह होता है। 


मुबारक हो थोड़ा फिल्मी लगता है,

पर बधाई हो , शुभता का प्रतीक होता है।


जल्दी करो, थोड़ा tense लगता है,

शीघ्र कीजिए, इसमें विश्राम का आभास होता है।


जरूरी काम  या आवश्यक कार्य ,

Time क्या है या समय बताओ।

मुझे पता है या मुझे ज्ञात है,

wait करो या प्रतीक्षा ,

Party करनी है या शुभ सम्मेलन,

शब्दों में सामर्थ्य बड़ा, इनका ले अवलंबन,

 आखिर शब्द से ही बनतीं हैं  भावनाएं और यह जीवन।

और मन अच्छा तो वो ही एक परम धन। 


चुनना हमें है, यह तो बस सुझाव है। 

पर हिंदी के शब्दों में है विनम्रता एवं सशक्तिकरण, यह मेरा विश्वास है।

हिंदी भाषा से सूझ बूझ की खुलतीं परते हैं,

तो चलिए इसे गंभीरता से जीवन में नियुक्त करते हैं,

हो सके तो दिन प्रतिदिन,

इसका उपयोग अत्यधिक करते हैं। 

खोए हुए आर्यत्व को पुनः स्थापित कर,

एक बार फिर अपनी मातृ भाषा का सम्मानसाहित धवाजारोहण करते हैं।



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Tuesday, June 17, 2025

.....

जो है सो तुझ में , 

तुझमें सो ही मुझमें , 

जो है नहीं , सो बिसरे , 

जो है , हर पल सो बरसे |


न सफर कहीं ,

मंज़िल भी नहीं ,

किसे पार पाने की  मज़दूरी ?

नदी नाव किनारा , जब एक ही | 


न चाह कोई है , न पुकार कोई है , 

जब पूरा आधार , पूरा आकाश यहीं है |





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Saturday, June 7, 2025

Bhagwat Geeta poetry - Part 1






शंखों की ध्वनि से गूंजता , 

सहस्त्र सेनाओं के मध्य में ,

एक महायोद्धा खड़ा एक दिन ,

कुरुक्षेत्र महायुद्ध के मैदान में |


पसीने में तर बतर , 

घबराता हुआ यूँ रो पड़ा , 

प्रशन्न किये उसने हज़ार ,

श्रीकृष्ण से जो हैं परम उदार |


नहीं लडूंगा में सखा ,

यह युद्ध करना पाप है ,

क्यों लड़ूँ उन अपनों से ,

भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य परम पूजनीयों से ?


क्या पाऊंगा विराट सेनाओं को मार के , 

एक एक योद्धा के पीछे , परिवार कितने अनेक ,

जीतूंगा या हारूंगा , यह भी नहीं  जानता ,

और जीत गया तो भी क्या हो, मैं  कुछ नहीं जानता |


जिस जीत के मुकुट पर सने हो रक्त के हीरे ,

उस जीत को धिक्कार है , सुख नहीं वो दुःख से घिरे |

नहीं चाह मुझे किसी राज्य की ,

नहीं चाह मुझे युद्ध करने की |


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उतार के रख दिया अर्जुन ने गांडीव धनुष को ,

चुप्पी में बैठ गया वो क्षत्रिय , जिसके पराक्रम की गाथाएं प्रबुद्ध थी |

जिसके बल , गुणों और संयम का उदाहरण देते देवी देवता भी ,

वो वीर हाथ जोड़ खड़ा हो गया , परीक्षा के क्षण में , मानो सूझ खो दी |

युद्ध नहीं करूंगा , कहके मौन हो गए ,

शरण में कृष्ण के , भाव खोल , यूँ  बैठ गए |


श्री कृष्ण मुस्कुराये , मानो खेल रचा हो , 

हमारा विवेक बढ़ाने को , ज्ञान की ज्योत जगाने को ,

अपने सुन्दर  शब्दों को , हर जीव से मिलाने को ,

हर जीवन में  शौर्य महकाने को , मानो अर्जुन निमित्त चुना हो |


हे परन्तप , दुश्मनों को जीत लेने वाला सदा ,

क्या हुआ तुम्हे इस क्षण में आज ?

कायर के जैसे क्यों हो रहे , 

और बुद्धिमान स्वयं को जान रहे ,

यह महायुद्ध के समय में ,

मोह के दलदल में  क्यों फस रहे ,

धर्म और अधर्म के इस युद्ध में , 

क्षत्रिय धर्म से मुख क्यों मोड़ रहे ?

शोक न करने के विषयों पर शोक किसलिए कर रहे ?


स्वयं ब्रह्म सत् चित्त आनंद है ,

और ब्रह्म स्वयं श्री कृष्ण हैं |

सहज बोले अर्जुन से ,

शब्द पिरोये ऐसे , जो निर्भय थे , परम थे  |

देह नहीं तुम सखा , तुम अनादि अमर हो आत्मा ,

तो किस बात का और किसके लिए शोक कर रहे ?


जनम मरण लीला प्रकृति की है  , 

तुम तो परमात्मा के अभिन्न अंग हो |

तो युद्ध करो , यश कीर्ति हासिल करो ,

यूँ बिन वजह खुद से न अन्याय करो |

धर्म युद्ध मिले सौभाग्य से ,

विचलित न हो , न इससे डरो |


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हे कृष्ण ! यदि हूँ मैं आत्मा , 

और समबुद्धि  ही मेरा कर्त्तव्य है ,

तो क्यों लगूं इस भयंकर कर्म में ,

जो  केवल देह नश्वर से हैं जुड़े ?


रहस्य कर्मयोग के श्री कृष्ण अब खोले यहाँ , 

अर्जुन  को दिए भगवत गीता का यह  दिव्य ज्ञान |


हे धनञ्जय , कर्म बिना रह सकते हो  जगत में ?

मुमकिन नहीं  सखा , कर्म ही प्रधान मनुष्य जीवन में |


................... to be continued...........



Tuesday, June 3, 2025

मन पंछी

 



पंछी उड़े जब अम्बर विशाल में ,

बंधन न लगे उसे आकाश में,

खुले गगन और मीठी हवाओं में,

मीलों उड़ जाए वो तो आसमान में।


कहते है पक्षी,  मुझसे ओ प्यारे,

मैं तो उड़ जाऊ बड़े नाज़ से,

चल ले चलूं तुझे भी उस आकाश में,

जहां मुक्त है सब सहज स्वभाव से। 


मैं मानव हु पक्षी नहीं,

मैंने कहा कुछ ऐतराज़ से।


पक्षी बोला मुझसे, क्यों घूम रहा इस चक्रव्यूह में ?

न जाने कब यह अवसर मिले, 

आ एक बार तो ,विशाल घन का आनंद ले,

इस बार तो ,आकाश की मस्ती में झूम ले। 


मैंने बोला अरे नहीं,

व्यस्त हूँ आज किसी काम से , 

तुम जायो अभी ,जहाँ है जाना ,

मिलते हैं फिर कभी आराम से |


पक्षी हस के मेरी नादानी पर लौट गया,

ढूंढा बहुत मैने उसे , पर अब वो न मिला,

समझ न पाए उन इशारों को जब समझना था, 

और इक अनमोल जनम , यूं ही खो दिया |


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बच्चे





मां ने जन्मा बच्चा,

या बच्चे ने जन्मा एक मां को।

कुछ ऐसा है जैसे,

हरियाली हुई पहले ?

या बरसीं धरा पर पहले बारिश की बूंदे ?


करुणा भरी निर्दोष मासूम आंखे,

उभारे करुणा वात्सल्य की बाहें,

मां की महिमा तो जग ज़ाहिर है, 

पर बच्चे ,मन के सच्चे ,

सहजता से जीवन जीना है कैसे ?

यह तो  इक नटखट बच्चे से ही सीखें |  



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