
सागर की एक लहर से पूछा मेनेतुम उथल पुथल इतना होती हो ,क्षणभंगुर का जीवन तुम्हारा ,कैसा लगता है ?कोई Identity खुद की भी होनी चाहिए न तुम्हारी ?लहर ने कहातुमने देखा मुझे किनारे पर जब समुन्द्र से अलग होने को थी ,देखना था मुझे उस गहराई में , जहा मैं गहरा समुन्द्र ही थी ,आकाश की विशालता को बादल में समेट सकते हो कैसे ?
सागर की करवटो को लहरों की Identity दे सकते हो कैसे ?जहा से उठी , वही पे रम गयी , वो ही थी और हु भी वही |
-Kanika