इक वृक्ष पर लगा पत्र ,जो zameen पर आ गिरा |
हरा भरा जो था , अब वैसा कहाँ रहा ||
हवा के संग जो चला , वो इधर उधर अकेला सा |
सोचा था रहूँगा हरा ,पर धीरे धीरे सुकड़ सा गया | |
याद आयी उसे अपने वृक्ष की , जहाँ वो लहलहाता सा था |
हर धुप में हर बारिश में उसीके संग खिलता सा था ||
दुनिया की दौड़ में , saadgi खो बैठा था ,
किसी ज़िद्द के पीछे , jatil बना बैठा था |
एक समय आया ,जब उसको kahin Ehsaas यह हुआ ,
हस्ती न थी कुछ उसकी, वो समझ यह गया |
मिटटी से बना मिटटी में मिला ,
और ..मिटटी ही होके अपने वृक्ष से जा मिला ||
Mauj में रहता है वो अब ,
बारिश में महकता सा है अब |
हर हाल में सम सा रहता है ,
वो पत्र पूर्णता का अनुभव करता है अब ||