नारी शक्ति स्नेह , संवेदना , पोषण, मातृत्व , शीलता और आत्म शक्ति की सुनहरी खान है ,
तो पुरुषत्व साहस ,स्थिरता ,संयम , सुरक्षा , अस्तित्व ,तर्क और विजय का उद्गम स्थान है |
दौड़ इस बात की न हो ,
की समाज पुरुष प्रधान है या स्त्री प्रधान ,
विचार इस बात का हो ,
की पुरुषत्व और नारी शक्ति क्या हर मानव में हो सकती हैं एक समान ?
जो देह मिली पुरुष की तो क्या पुरुषत्व का सम्मान हम कर पाए ?
जो देह मिली नारी की तो क्या शक्ति को सम्मान हम दे पाए ?
कहतें हैं उपनिषद , गीता यही |
समझना स्वयं को देह केवल , मानव का परम लक्ष्य नहीं |
खोजे स्वयं को जो पाए , शिव शक्ति में भेद नहीं ,
फिर दौड़ कहाँ , अंतर भी कहाँ , जब सब एक वही ||
मान्यताओं और कल्पनाओ के ढेर से सृष्टि सजी ,
हटें कल्पनाओं के बादल जब , निर्दोष प्रेम की ही बंसी सुनी |

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