एक तुम हो , जो रौशनी बन फिर मुझे जगाते हो |
एक मैं हूँ , जो प्यार के दो शब्द भी नहीं जानती ,
और एक तुम , जो सदिओं से प्रेम की डोर में जाने कितनो को बांधे हो |
एक मैं , कोयले की खान ,
एक तुम , अनमोल हीरों के बागान |एक मालिक , और एक दास , फिर भी मिलने की आस |
मन की शीतल छाया में करके वास ,ह्रदय के सूरज में करते हो महारास |
एक तुम जो अनंत जीवों का प्रति क्षण पालन करते हो ,
एक मैं जो धन्यवाद दूँ , यह भी याद न रख पाती हूँ |
एक मैं हूँ जो दुनिया की दौड़ धुप में न जाने कितनी बार लड़खलाती हूँ |
एक तुम , जो हर बार 'उठ प्यारे ' यूँ कहकर , फिर चलाते हो |
