Tuesday, June 3, 2025

बच्चे





मां ने जन्मा बच्चा,

या बच्चे ने जन्मा एक मां को।

कुछ ऐसा है जैसे,

हरियाली हुई पहले ?

या बरसीं धरा पर पहले बारिश की बूंदे ?


करुणा भरी निर्दोष मासूम आंखे,

उभारे करुणा वात्सल्य की बाहें,

मां की महिमा तो जग ज़ाहिर है, 

पर बच्चे ,मन के सच्चे ,

सहजता से जीवन जीना है कैसे ?

यह तो  इक नटखट बच्चे से ही सीखें |  



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Thursday, November 14, 2024

अनुभव


शोर में जिंदगी ,
और एकांत में ज़िन्दगी |
बड़ा फर्क होता है ,
एक में हल्ला गुल्ला ,
तो दुसरे में सन्नाटा होता है |
कोनसी बेहतर ,
यह तो अपने mood पर ही निर्भर होता है |
कभी अकेलापन ही सब दे जाए,
और कभी भीड़ भाड़ में भी खालीपन सा लगता है |
पर गहराई से सोचूं तो ,
दोनों जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं ,
क्यूंकि समता की परख तो,
इन दोनों परिस्थितियों में ही  होती है  |
वैसे तो हाथ में हमारे कुछ नहीं,
सब भगवान् जी की लीला होती है |
पर इस लीला की स्पष्टता भी, 
अंतर्मन के अनुभव से ही होती है |
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Friday, November 24, 2023

Ek main aur Ek Tum













एक मैं हूँ , जो अक्सर  दुनिया में खो जाती हूँ ,

एक तुम हो , जो रौशनी बन फिर मुझे जगाते हो |


एक मैं हूँ , जो प्यार के दो शब्द भी नहीं जानती , 

और एक तुम , जो सदिओं से प्रेम की डोर में जाने कितनो को बांधे हो |


एक मैं , कोयले की खान  ,

एक तुम , अनमोल  हीरों के बागान |


एक मालिक , और एक दास , फिर भी मिलने की आस |

मन की शीतल छाया में  करके वास  ,ह्रदय के सूरज में करते हो महारास |


एक तुम जो  अनंत जीवों  का प्रति क्षण पालन करते हो ,

एक मैं जो धन्यवाद दूँ , यह भी याद न रख पाती हूँ |


एक मैं हूँ  जो दुनिया की दौड़ धुप  में न जाने कितनी बार लड़खलाती हूँ |

एक तुम , जो हर बार 'उठ प्यारे ' यूँ कहकर ,  फिर चलाते हो  |



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Thursday, February 24, 2022

एक किस्सा पत्र का |


                                            

इक वृक्ष  पर लगा  पत्र  ,जो  zameen पर आ गिरा |

हरा भरा जो था , अब वैसा कहाँ रहा ||


हवा  के  संग  जो  चला , वो  इधर  उधर  अकेला  सा |

सोचा  था  रहूँगा  हरा  ,पर  धीरे  धीरे  सुकड़  सा  गया | |


याद  आयी  उसे  अपने  वृक्ष  की , जहाँ  वो  लहलहाता  सा  था |

हर  धुप  में  हर  बारिश  में  उसीके  संग  खिलता  सा  था ||


दुनिया  की  दौड़  में  , saadgi खो  बैठा  था ,

किसी  ज़िद्द  के  पीछे , jatil बना  बैठा  था | 


एक समय आया  ,जब  उसको  kahin Ehsaas यह   हुआ , 

हस्ती  न  थी  कुछ उसकी,  वो  समझ  यह  गया |

मिटटी  से  बना  मिटटी  में  मिला ,

और ..मिटटी  ही होके अपने  वृक्ष  से  जा  मिला ||


Mauj  में  रहता  है  वो  अब , 

बारिश  में  महकता  सा है अब | 

हर  हाल  में  सम सा  रहता  है ,

वो  पत्र  पूर्णता का अनुभव करता है अब ||

 


Sunday, October 11, 2020

What Matters (Hinglish)

वो वक़्त बढ़िया था जब T.V और Phone होते न थे , 

Atleast लोग जहाँ होते , असली में वही होते तो थे|


आज तन कहीं और मन कहीं होता है ,

Present में जीना क्या है ? 

मुश्किल सा प्रतीत होता है |


दो पल का जीवन यहाँ , 

प्यारे , दो पल का जीवन |


Technologies,Globalization अच्छी लग भी जाएँ,  

पर atlast 'हरि' का भजन कितना हुआ  ? 

matter करता इतना ही है |  






Wednesday, September 30, 2020

Identity




सागर की एक लहर से पूछा मेने 

तुम उथल पुथल इतना होती हो ,
क्षणभंगुर का जीवन तुम्हारा ,
कैसा लगता है ?
कोई Identity खुद की भी होनी चाहिए न तुम्हारी ?

लहर ने कहा 

 तुमने देखा मुझे किनारे पर जब समुन्द्र से अलग होने को थी ,
देखना था मुझे उस गहराई में , जहा मैं गहरा समुन्द्र ही थी ,
आकाश की विशालता को बादल में समेट सकते हो कैसे ?

 

सागर की करवटो को लहरों  की Identity दे सकते हो कैसे ?
जहा से उठी , वही पे रम गयी , वो ही थी और हु भी वही |

                                                    -Kanika



 

Monday, May 25, 2020

संघर्ष

संघर्षो से जुड़ा यह जीवन , 

कर्मों के बाणों से बनता बिगड़ता यह जीवन |

एक एक पल में बिखरती मान्यताएं सभी ,

मुक्त जीव तभी जब अहम् टूट जाएँ सभी |

समय की चाल बदले हर दिन यहाँ ,किसी चाल में सेनापति,

अगली ही चाल में शत्रु बने ||

 

डर नहीं संघर्ष से,निर्भयता ही मेरी पहचान है ,पर असमंजस की लहरों में डोलता यह जीवन |

कहाँ खड़े ,क्यों खड़े , किधर ले जा रहे हमें |

न ज्ञान है , न राह है , प्रभु बस एक तुम्हारी आस है ||


कश्ती मेरी ,सागर तेरा ,आस मेरी पर कृपा तुम्हारी है |

क्या पाउ कृपा बिना , जब तुम ही आधार और यह सृष्टि भी तुम्हारी है ||

 

निशब्द हूँ प्रभु , शब्दों में क्या बताऊँ तुम्हे |

सादगी से तुम मिलो ,नहीं छल कपट से ,सादगी कैसे मिले इस कलिकाल के ललाट पे |


कुशलता नहीं है मुझमें ,न मेरे व्यव्हार में ,अनजाने में रोज़ भूलें करते है संसार में |

इसी प्रतीक्षा में यूँ दिन ,काल बीत रहे ,कब मिलोगे कैसे मिलोगे, प्रशन्नो  में  सभी  उलझ रहे ||