पंछी उड़े जब अम्बर विशाल में ,
बंधन न लगे उसे आकाश में,
खुले गगन और मीठी हवाओं में,
मीलों उड़ जाए वो तो आसमान में।
कहते है पक्षी, मुझसे ओ प्यारे,
मैं तो उड़ जाऊ बड़े नाज़ से,
चल ले चलूं तुझे भी उस आकाश में,
जहां मुक्त है सब सहज स्वभाव से।
मैं मानव हु पक्षी नहीं,
मैंने कहा कुछ ऐतराज़ से।
पक्षी बोला मुझसे, क्यों घूम रहा इस चक्रव्यूह में ?
न जाने कब यह अवसर मिले,
आ एक बार तो ,विशाल घन का आनंद ले,
इस बार तो ,आकाश की मस्ती में झूम ले।
मैंने बोला अरे नहीं,
व्यस्त हूँ आज किसी काम से ,
तुम जायो अभी ,जहाँ है जाना ,
मिलते हैं फिर कभी आराम से |
पक्षी हस के मेरी नादानी पर लौट गया,
ढूंढा बहुत मैने उसे , पर अब वो न मिला,
समझ न पाए उन इशारों को जब समझना था,
और इक अनमोल जनम , यूं ही खो दिया |
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