
शंखों की ध्वनि से गूंजता ,
सहस्त्र सेनाओं के मध्य में ,
एक महायोद्धा खड़ा एक दिन ,
कुरुक्षेत्र महायुद्ध के मैदान में |
पसीने में तर बतर ,
घबराता हुआ यूँ रो पड़ा ,
प्रशन्न किये उसने हज़ार ,
श्रीकृष्ण से जो हैं परम उदार |
नहीं लडूंगा में सखा ,
यह युद्ध करना पाप है ,
क्यों लड़ूँ उन अपनों से ,
भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य परम पूजनीयों से ?
क्या पाऊंगा विराट सेनाओं को मार के ,
एक एक योद्धा के पीछे , परिवार कितने अनेक ,
जीतूंगा या हारूंगा , यह भी नहीं जानता ,
और जीत गया तो भी क्या हो, मैं कुछ नहीं जानता |
जिस जीत के मुकुट पर सने हो रक्त के हीरे ,
उस जीत को धिक्कार है , सुख नहीं वो दुःख से घिरे |
नहीं चाह मुझे किसी राज्य की ,
नहीं चाह मुझे युद्ध करने की |
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उतार के रख दिया अर्जुन ने गांडीव धनुष को ,
चुप्पी में बैठ गया वो क्षत्रिय , जिसके पराक्रम की गाथाएं प्रबुद्ध थी |
जिसके बल , गुणों और संयम का उदाहरण देते देवी देवता भी ,
वो वीर हाथ जोड़ खड़ा हो गया , परीक्षा के क्षण में , मानो सूझ खो दी |
युद्ध नहीं करूंगा , कहके मौन हो गए ,
शरण में कृष्ण के , भाव खोल , यूँ बैठ गए |
श्री कृष्ण मुस्कुराये , मानो खेल रचा हो ,
हमारा विवेक बढ़ाने को , ज्ञान की ज्योत जगाने को ,
अपने सुन्दर शब्दों को , हर जीव से मिलाने को ,
हर जीवन में शौर्य महकाने को , मानो अर्जुन निमित्त चुना हो |
हे परन्तप , दुश्मनों को जीत लेने वाला सदा ,
क्या हुआ तुम्हे इस क्षण में आज ?
कायर के जैसे क्यों हो रहे ,
और बुद्धिमान स्वयं को जान रहे ,
यह महायुद्ध के समय में ,
मोह के दलदल में क्यों फस रहे ,
धर्म और अधर्म के इस युद्ध में ,
क्षत्रिय धर्म से मुख क्यों मोड़ रहे ?
शोक न करने के विषयों पर शोक किसलिए कर रहे ?
स्वयं ब्रह्म सत् चित्त आनंद है ,
और ब्रह्म स्वयं श्री कृष्ण हैं |
सहज बोले अर्जुन से ,
शब्द पिरोये ऐसे , जो निर्भय थे , परम थे |
देह नहीं तुम सखा , तुम अनादि अमर हो आत्मा ,
तो किस बात का और किसके लिए शोक कर रहे ?
जनम मरण लीला प्रकृति की है ,
तुम तो परमात्मा के अभिन्न अंग हो |
तो युद्ध करो , यश कीर्ति हासिल करो ,
यूँ बिन वजह खुद से न अन्याय करो |
धर्म युद्ध मिले सौभाग्य से ,
विचलित न हो , न इससे डरो |
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हे कृष्ण ! यदि हूँ मैं आत्मा ,
और समबुद्धि ही मेरा कर्त्तव्य है ,
तो क्यों लगूं इस भयंकर कर्म में ,
जो केवल देह नश्वर से हैं जुड़े ?
रहस्य कर्मयोग के श्री कृष्ण अब खोले यहाँ ,
अर्जुन को दिए भगवत गीता का यह दिव्य ज्ञान |
हे धनञ्जय , कर्म बिना रह सकते हो जगत में ?
मुमकिन नहीं सखा , कर्म ही प्रधान मनुष्य जीवन में |
................... to be continued...........