Tuesday, June 17, 2025

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जो है सो तुझ में , 

तुझमें सो ही मुझमें , 

जो है नहीं , सो बिसरे , 

जो है , हर पल सो बरसे |


न सफर कहीं ,

मंज़िल भी नहीं ,

किसे पार पाने की  मज़दूरी ?

नदी नाव किनारा , जब एक ही | 


न चाह कोई है , न पुकार कोई है , 

जब पूरा आधार , पूरा आकाश यहीं है |





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Saturday, June 7, 2025

Bhagwat Geeta poetry - Part 1






शंखों की ध्वनि से गूंजता , 

सहस्त्र सेनाओं के मध्य में ,

एक महायोद्धा खड़ा एक दिन ,

कुरुक्षेत्र महायुद्ध के मैदान में |


पसीने में तर बतर , 

घबराता हुआ यूँ रो पड़ा , 

प्रशन्न किये उसने हज़ार ,

श्रीकृष्ण से जो हैं परम उदार |


नहीं लडूंगा में सखा ,

यह युद्ध करना पाप है ,

क्यों लड़ूँ उन अपनों से ,

भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य परम पूजनीयों से ?


क्या पाऊंगा विराट सेनाओं को मार के , 

एक एक योद्धा के पीछे , परिवार कितने अनेक ,

जीतूंगा या हारूंगा , यह भी नहीं  जानता ,

और जीत गया तो भी क्या हो, मैं  कुछ नहीं जानता |


जिस जीत के मुकुट पर सने हो रक्त के हीरे ,

उस जीत को धिक्कार है , सुख नहीं वो दुःख से घिरे |

नहीं चाह मुझे किसी राज्य की ,

नहीं चाह मुझे युद्ध करने की |


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उतार के रख दिया अर्जुन ने गांडीव धनुष को ,

चुप्पी में बैठ गया वो क्षत्रिय , जिसके पराक्रम की गाथाएं प्रबुद्ध थी |

जिसके बल , गुणों और संयम का उदाहरण देते देवी देवता भी ,

वो वीर हाथ जोड़ खड़ा हो गया , परीक्षा के क्षण में , मानो सूझ खो दी |

युद्ध नहीं करूंगा , कहके मौन हो गए ,

शरण में कृष्ण के , भाव खोल , यूँ  बैठ गए |


श्री कृष्ण मुस्कुराये , मानो खेल रचा हो , 

हमारा विवेक बढ़ाने को , ज्ञान की ज्योत जगाने को ,

अपने सुन्दर  शब्दों को , हर जीव से मिलाने को ,

हर जीवन में  शौर्य महकाने को , मानो अर्जुन निमित्त चुना हो |


हे परन्तप , दुश्मनों को जीत लेने वाला सदा ,

क्या हुआ तुम्हे इस क्षण में आज ?

कायर के जैसे क्यों हो रहे , 

और बुद्धिमान स्वयं को जान रहे ,

यह महायुद्ध के समय में ,

मोह के दलदल में  क्यों फस रहे ,

धर्म और अधर्म के इस युद्ध में , 

क्षत्रिय धर्म से मुख क्यों मोड़ रहे ?

शोक न करने के विषयों पर शोक किसलिए कर रहे ?


स्वयं ब्रह्म सत् चित्त आनंद है ,

और ब्रह्म स्वयं श्री कृष्ण हैं |

सहज बोले अर्जुन से ,

शब्द पिरोये ऐसे , जो निर्भय थे , परम थे  |

देह नहीं तुम सखा , तुम अनादि अमर हो आत्मा ,

तो किस बात का और किसके लिए शोक कर रहे ?


जनम मरण लीला प्रकृति की है  , 

तुम तो परमात्मा के अभिन्न अंग हो |

तो युद्ध करो , यश कीर्ति हासिल करो ,

यूँ बिन वजह खुद से न अन्याय करो |

धर्म युद्ध मिले सौभाग्य से ,

विचलित न हो , न इससे डरो |


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हे कृष्ण ! यदि हूँ मैं आत्मा , 

और समबुद्धि  ही मेरा कर्त्तव्य है ,

तो क्यों लगूं इस भयंकर कर्म में ,

जो  केवल देह नश्वर से हैं जुड़े ?


रहस्य कर्मयोग के श्री कृष्ण अब खोले यहाँ , 

अर्जुन  को दिए भगवत गीता का यह  दिव्य ज्ञान |


हे धनञ्जय , कर्म बिना रह सकते हो  जगत में ?

मुमकिन नहीं  सखा , कर्म ही प्रधान मनुष्य जीवन में |


................... to be continued...........



Tuesday, June 3, 2025

मन पंछी

 



पंछी उड़े जब अम्बर विशाल में ,

बंधन न लगे उसे आकाश में,

खुले गगन और मीठी हवाओं में,

मीलों उड़ जाए वो तो आसमान में।


कहते है पक्षी,  मुझसे ओ प्यारे,

मैं तो उड़ जाऊ बड़े नाज़ से,

चल ले चलूं तुझे भी उस आकाश में,

जहां मुक्त है सब सहज स्वभाव से। 


मैं मानव हु पक्षी नहीं,

मैंने कहा कुछ ऐतराज़ से।


पक्षी बोला मुझसे, क्यों घूम रहा इस चक्रव्यूह में ?

न जाने कब यह अवसर मिले, 

आ एक बार तो ,विशाल घन का आनंद ले,

इस बार तो ,आकाश की मस्ती में झूम ले। 


मैंने बोला अरे नहीं,

व्यस्त हूँ आज किसी काम से , 

तुम जायो अभी ,जहाँ है जाना ,

मिलते हैं फिर कभी आराम से |


पक्षी हस के मेरी नादानी पर लौट गया,

ढूंढा बहुत मैने उसे , पर अब वो न मिला,

समझ न पाए उन इशारों को जब समझना था, 

और इक अनमोल जनम , यूं ही खो दिया |


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बच्चे





मां ने जन्मा बच्चा,

या बच्चे ने जन्मा एक मां को।

कुछ ऐसा है जैसे,

हरियाली हुई पहले ?

या बरसीं धरा पर पहले बारिश की बूंदे ?


करुणा भरी निर्दोष मासूम आंखे,

उभारे करुणा वात्सल्य की बाहें,

मां की महिमा तो जग ज़ाहिर है, 

पर बच्चे ,मन के सच्चे ,

सहजता से जीवन जीना है कैसे ?

यह तो  इक नटखट बच्चे से ही सीखें |  



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Thursday, November 14, 2024

अनुभव


शोर में जिंदगी ,
और एकांत में ज़िन्दगी |
बड़ा फर्क होता है ,
एक में हल्ला गुल्ला ,
तो दुसरे में सन्नाटा होता है |
कोनसी बेहतर ,
यह तो अपने mood पर ही निर्भर होता है |
कभी अकेलापन ही सब दे जाए,
और कभी भीड़ भाड़ में भी खालीपन सा लगता है |
पर गहराई से सोचूं तो ,
दोनों जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं ,
क्यूंकि समता की परख तो,
इन दोनों परिस्थितियों में ही  होती है  |
वैसे तो हाथ में हमारे कुछ नहीं,
सब भगवान् जी की लीला होती है |
पर इस लीला की स्पष्टता भी, 
अंतर्मन के अनुभव से ही होती है |
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Friday, November 24, 2023

Ek main aur Ek Tum













एक मैं हूँ , जो अक्सर  दुनिया में खो जाती हूँ ,

एक तुम हो , जो रौशनी बन फिर मुझे जगाते हो |


एक मैं हूँ , जो प्यार के दो शब्द भी नहीं जानती , 

और एक तुम , जो सदिओं से प्रेम की डोर में जाने कितनो को बांधे हो |


एक मैं , कोयले की खान  ,

एक तुम , अनमोल  हीरों के बागान |


एक मालिक , और एक दास , फिर भी मिलने की आस |

मन की शीतल छाया में  करके वास  ,ह्रदय के सूरज में करते हो महारास |


एक तुम जो  अनंत जीवों  का प्रति क्षण पालन करते हो ,

एक मैं जो धन्यवाद दूँ , यह भी याद न रख पाती हूँ |


एक मैं हूँ  जो दुनिया की दौड़ धुप  में न जाने कितनी बार लड़खलाती हूँ |

एक तुम , जो हर बार 'उठ प्यारे ' यूँ कहकर ,  फिर चलाते हो  |



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Thursday, February 24, 2022

एक किस्सा पत्र का |


                                            

इक वृक्ष  पर लगा  पत्र  ,जो  zameen पर आ गिरा |

हरा भरा जो था , अब वैसा कहाँ रहा ||


हवा  के  संग  जो  चला , वो  इधर  उधर  अकेला  सा |

सोचा  था  रहूँगा  हरा  ,पर  धीरे  धीरे  सुकड़  सा  गया | |


याद  आयी  उसे  अपने  वृक्ष  की , जहाँ  वो  लहलहाता  सा  था |

हर  धुप  में  हर  बारिश  में  उसीके  संग  खिलता  सा  था ||


दुनिया  की  दौड़  में  , saadgi खो  बैठा  था ,

किसी  ज़िद्द  के  पीछे , jatil बना  बैठा  था | 


एक समय आया  ,जब  उसको  kahin Ehsaas यह   हुआ , 

हस्ती  न  थी  कुछ उसकी,  वो  समझ  यह  गया |

मिटटी  से  बना  मिटटी  में  मिला ,

और ..मिटटी  ही होके अपने  वृक्ष  से  जा  मिला ||


Mauj  में  रहता  है  वो  अब , 

बारिश  में  महकता  सा है अब | 

हर  हाल  में  सम सा  रहता  है ,

वो  पत्र  पूर्णता का अनुभव करता है अब ||